शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव की महिमा का वर्णन करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली और प्रसिद्ध स्तोत्र है। इसे रावण द्वारा रचित माना जाता है, जो भगवान शिव के परम भक्त थे।
यह स्तोत्र भगवान शिव के तांडव (नृत्य) और उनके दिव्य, ऊर्जावान स्वरूप को दर्शाता है। इसका पाठ करने से भक्ति, ऊर्जा और मानसिक शक्ति में वृद्धि होती है।
शिव तांडव स्तोत्र लिरिक्स (Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi)
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः॥
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-
द्ध्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-
गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललाटफाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥
इदं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिन्तनम्॥
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनमिदं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥
Shiv Tandav Stotram Lyrics in English
Jatatavigalajjala Pravahapavitasthale
Galevalambya Lambitam Bhujanga Tunga Malikam
Damad Damad Damaddama Ninadavadamarvayam
Chakara Chandatandavam Tanotu Nah Shivah Shivam
Jata Kataha Sambhrama Bhramanilimpanirjhari
Vilolavichivallari Virajamanamurdhani
Dhagadhagadhagajjvala Lalata Pattapavake
Kishora Chandrashekhare Ratih Pratikshanam Mama
Dharadharendra Nandini Vilasa Bandhu Bandhura
Sphuraddiganta Santati Pramodamana Manase
Kripakataksha Dhorani Niruddha Durdharapadi
Kwachidigambare Mano Vinodametu Vastuni
Jatabhujanga Pingala Sphurat Phanamaniprabha
Kadambakunkumadrava Pralipta Digvadhumukhe
Madandha Sindhurasphurat Tvaguttariya Medure
Mano Vinodamadbhutam Bibhartu Bhutabhartari
Sahasralochana Prabhritya Shesha Lekha Shekhara
Prasuna Dhuli Dhorani Vidhusaranghri Peethabhuh
Bhujangaraja Malaya Nibaddha Jata Jootaka
Shriyai Chiraya Jayatam Chakora Bandhu Shekhara
Lalata Chatvara Jvaladdhananjaya Sphulingabha
Nipita Panchasayakam Namannilimpanayakam
Sudhamayukha Lekhaya Virajamana Shekharam
Mahakapali Sampade Shiro Jatalamastu Nah
Karala Bhala Pattika Dhagad Dhagad Dhagajjvala
Dhananjayahuti Krita Prachanda Panchasayake
Dharadharendra Nandini Kuchagra Chitra Patraka
Prakalpanaika Shilpini Trilochane Ratirmama
Naveena Megha Mandali Niruddha Durdhara Sphurat
Kuhunishithini Tamah Prabandha Baddha Kandharah
Nilimpa Nirjhari Dharastanotu Kritti Sindhurah
Kalanidhanabandhurah Shriyam Jagaddhurandharah
Praphulla Neela Pankaja Prapancha Kalima Prabha
Valambi Kantha Kandali Ruchi Prabaddha Kandharam
Smarachhidam Purachhidam Bhavachhidam Makhachhidam
Gajachhidandhakachhidam Tamantakachhidam Bhaje
Akherva Sarva Mangala Kalakadamba Manjari
Rasa Pravaha Madhuri Vijrimbhana Madhuvratam
Smarantakam Purantakam Bhavantakam Makhantakam
Gajantakandhakantakam Tamantakantakam Bhaje
Jayatvadabhravibhrama Bhramadbhujangamashvasa
Dhvinirgamatkramasphurat Karala Bhala Havyavat
Dhimiddhimiddhimidhvanan Mridanga Tunga Mangala
Dhvanikramapravartita Prachanda Tandavah Shivah
Drishadvichitra Talpayor Bhujanga Mauktika Srajor
Garishtha Ratna Loshtayoh Suhrid Vipaksha Pakshayoh
Trunaravinda Chakshushoh Prajamahi Mahendrayoh
Samapravrittikah Kada Sadashivam Bhajamyaham
Kada Nilimpa Nirjhari Nikunja Kotare Vasan
Vimukta Durmatih Sada Shirahsthamanjalim Vahan
Vimukta Lolah Lochano Lalata Phalalagnakah
Shiveti Mantramuchcharan Kada Sukhi Bhavamyaham
Idam Hi Nityamevamuktam Uttamottamam Stavam
Pathansmaranbruvannaro Vishuddhimeti Santatam
Hare Gurau Subhaktimashu Yati Nanyatha Gatim
Vimohanam Hi Dehinam Sushankarasya Chintanam
Pujavasana Samaye Dashavaktra Geetam
Yah Shambhu Poojanamidam Pathati Pradoshe
Tasya Sthiram Rathagajendra Turangayuktam
Lakshmim Sadaiva Sumukhim Pradadati Shambhuh
शिव तांडव स्तोत्र का अर्थ (Meaning in Hindi)
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥
इस श्लोक में भगवान शिव के दिव्य और शक्तिशाली तांडव स्वरूप का अद्भुत वर्णन किया गया है, जो शिव तांडव स्तोत्र की शुरुआत करता है।
“जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले”
अर्थ: भगवान शिव की जटाओं से बहने वाली गंगा के जल से पूरा स्थान पवित्र हो रहा है। उनकी जटाएँ एक वन (जटाटवी) की तरह फैली हुई हैं, जिनसे गंगा प्रवाहित होती है।
“गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्”
अर्थ: भगवान शिव ने अपने गले में ऊँचे फनों वाले सर्पों की माला धारण की हुई है, जो उनकी शक्ति और निर्भयता को दर्शाती है।
“डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं”
अर्थ: उनके डमरू से निकलने वाली “डम-डम” की ध्वनि पूरे ब्रह्मांड में गूंज रही है, जो सृजन और ऊर्जा का प्रतीक है।
“चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्”
अर्थ: भगवान शिव अपने प्रचंड तांडव नृत्य का प्रदर्शन कर रहे हैं, और वे हमें कल्याण (शुभ) प्रदान करें।
सरल समझ:
यह श्लोक भगवान शिव के उस रूप को दर्शाता है जिसमें वे सृजन और विनाश दोनों की शक्ति के साथ तांडव कर रहे हैं। गंगा, सर्प और डमरू—ये सभी उनके दिव्य और अनंत स्वरूप के प्रतीक हैं।
यह शिव तांडव स्तोत्र का प्रारंभिक श्लोक हमें भगवान शिव की शक्ति, ऊर्जा और दिव्यता का अनुभव कराता है।
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥
इस श्लोक में भगवान शिव के दिव्य और तेजस्वी स्वरूप का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है, जो शिव तांडव स्तोत्र की गहराई को दर्शाता है।
“जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि”
अर्थ: भगवान शिव की जटाओं में बहने वाली गंगा (देवों की नदी) की लहरें इधर-उधर लहराती हुई उनके सिर को सुशोभित कर रही हैं। उनकी जटाएँ ऐसे घूम रही हैं जैसे कोई पवित्र जलधारा गतिमान हो।
“धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके”
अर्थ: उनके ललाट (माथे) पर अग्नि प्रज्वलित हो रही है, जो “धग-धग” की ध्वनि के साथ तेजस्वी रूप से जल रही है। यह अग्नि उनके तीसरे नेत्र की शक्ति को दर्शाती है, जो अज्ञान और बुराई का नाश करती है।
“किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम”
अर्थ: उनके मस्तक पर सुशोभित छोटा चंद्रमा (चंद्रकला) उनकी सुंदरता को और बढ़ाता है, और मेरा मन हर क्षण ऐसे भगवान शिव में प्रेम और भक्ति से जुड़ा रहे।
सरल समझ:
यह श्लोक भगवान शिव के उस अद्भुत रूप को दिखाता है जिसमें एक ओर उनकी जटाओं से बहती गंगा शांति और पवित्रता का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर उनके ललाट की अग्नि शक्ति और विनाश का प्रतीक है।
यह संतुलन ही भगवान शिव की विशेषता है—वे एक साथ शांत और शक्तिशाली दोनों हैं। इस श्लोक का भाव यह है कि हमारा मन हर समय भगवान शिव की भक्ति में लगा रहे।
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥
इस श्लोक में भगवान शिव के करुणामय और सौम्य स्वरूप का वर्णन किया गया है, जहाँ वे माता पार्वती के साथ विराजमान हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं।
“धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर- स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे”
अर्थ: भगवान शिव, जो पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती (धराधरेन्द्रनन्दिनी) के साथ आनंदपूर्वक निवास करते हैं, उनका मन सदा प्रसन्न रहता है और उनकी दिव्यता पूरे ब्रह्मांड में फैली हुई है।
“कृपाकटाक्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि”
अर्थ: भगवान शिव की कृपा भरी दृष्टि (कृपाकटाक्ष) ऐसी है जो बड़े से बड़े संकट और कठिनाई को भी रोक सकती है। उनकी कृपा से असंभव लगने वाली समस्याएँ भी समाप्त हो जाती हैं।
“क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि”
अर्थ: वे दिगम्बर (साधारण, बिना आडंबर के) रूप में रहते हैं, और मेरा मन ऐसे भगवान शिव के दिव्य स्वरूप में आनंद और शांति प्राप्त करे।
सरल समझ:
यह श्लोक हमें भगवान शिव के उस रूप से परिचित कराता है जो प्रेम, करुणा और सरलता से भरा हुआ है। वे माता पार्वती के साथ आनंद में रहते हैं और अपने भक्तों के सभी दुखों को अपनी कृपा से दूर करते हैं।
यह शिव तांडव स्तोत्र का एक महत्वपूर्ण भाग है, जो हमें सिखाता है कि भगवान शिव केवल शक्तिशाली ही नहीं, बल्कि अत्यंत दयालु और भक्तों के रक्षक भी हैं।
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥
इस श्लोक में भगवान शिव के अद्भुत और अलौकिक स्वरूप का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है, जहाँ उनके श्रृंगार और दिव्यता का चित्रण किया गया है।
“जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा- कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे”
अर्थ: भगवान शिव की जटाओं में लिपटे हुए पीले-भूरे रंग के सर्पों के फनों पर जड़े रत्न चमक रहे हैं। उनकी चमक चारों दिशाओं को ऐसे प्रकाशित कर रही है मानो उन पर कुमकुम का लेप हो गया हो।
“मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे”
अर्थ: वे मदमस्त हाथी की चमड़ी (गजचर्म) को वस्त्र के रूप में धारण किए हुए हैं, जो उनकी शक्ति और वैराग्य का प्रतीक है।
“मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि”
अर्थ: ऐसे समस्त प्राणियों के पालनकर्ता (भूतभर्ता) भगवान शिव का यह अद्भुत रूप मेरे मन को आनंद और शांति प्रदान करे।
सरल समझ:
यह श्लोक भगवान शिव के उस दिव्य रूप को दर्शाता है जिसमें सर्पों की माला, चमकते रत्न और गजचर्म उनके अलौकिक और निर्भीक स्वरूप को प्रकट करते हैं।
यह शिव तांडव स्तोत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो हमें यह सिखाता है कि भगवान शिव भौतिक आडंबरों से परे हैं, लेकिन फिर भी उनका स्वरूप अत्यंत आकर्षक और दिव्य है। उनके इस रूप का ध्यान करने से मन में शांति और भक्ति दोनों उत्पन्न होती हैं।
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥
इस श्लोक में भगवान शिव की महिमा और उनके चरणों की पूजा का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है, जहाँ देवता भी उनके आगे नतमस्तक होते हैं।
“सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर- प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः”
अर्थ: इंद्र (सहस्रलोचन) और अन्य देवता भगवान शिव के चरणों में पुष्प अर्पित करते हैं। उन फूलों की धूल से उनके चरण और आस-पास का स्थान पवित्र और सुशोभित हो जाता है।
“भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः”
अर्थ: भगवान शिव ने अपनी जटाओं में सर्पराज (नाग) की माला धारण की हुई है, जो उनकी शक्ति और निर्भयता को दर्शाती है।
“श्रिये चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः”
अर्थ: उनके मस्तक पर सुशोभित चंद्रमा (चकोर के प्रिय) उनकी शोभा को बढ़ाता है, और वे हमें सदा के लिए सुख, समृद्धि और कल्याण प्रदान करें।
सरल समझ:
यह श्लोक भगवान शिव की महानता को दर्शाता है, जहाँ बड़े-बड़े देवता भी उनकी पूजा करते हैं। उनके चरणों की धूल भी पवित्र मानी जाती है, और उनका सर्प तथा चंद्रमा से सुसज्जित स्वरूप उनकी दिव्यता को प्रकट करता है।
यह शिव तांडव स्तोत्र का एक महत्वपूर्ण भाग है, जो हमें सिखाता है कि भगवान शिव सभी देवताओं से श्रेष्ठ हैं और उनकी भक्ति से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि प्राप्त होती है।
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः॥
इस श्लोक में भगवान शिव के तेजस्वी, रक्षक और दिव्य स्वरूप का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन किया गया है, जो शिव तांडव स्तोत्र की गहराई को दर्शाता है।
“ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्”
अर्थ: भगवान शिव के ललाट (माथे) से प्रज्वलित अग्नि की चिंगारियाँ निकल रही हैं, जिनसे कामदेव (पंचसायक) भस्म हो गए। देवताओं के स्वामी भी उनके सामने नतमस्तक होते हैं।
“सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं”
अर्थ: उनके मस्तक पर चंद्रमा (अमृत की किरणों वाला) सुशोभित है, जो उनकी शांत और शीतल प्रकृति को दर्शाता है।
“महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः”
अर्थ: उनकी जटाएँ और उनका यह दिव्य स्वरूप हमें समृद्धि, शक्ति और कल्याण प्रदान करे।
सरल समझ:
यह श्लोक भगवान शिव के उस रूप को दर्शाता है जिसमें एक ओर उनका तीसरा नेत्र अग्नि के समान तेजस्वी है, जो बुराई और अहंकार का नाश करता है, और दूसरी ओर उनके मस्तक पर चंद्रमा उनकी शांति और संतुलन को दर्शाता है।
यह हमें सिखाता है कि भगवान शिव में शक्ति और शांति दोनों का अद्भुत संतुलन है। उनके इस रूप का ध्यान करने से जीवन में साहस, संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥
इस श्लोक में भगवान शिव के उग्र और सौम्य दोनों स्वरूपों का सुंदर संगम दिखाई देता है, जो शिव तांडव स्तोत्र की विशेषता है।
“करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके”
अर्थ: भगवान शिव के भाल (माथे) पर भयानक रूप से प्रज्वलित अग्नि जल रही है, जिसकी ज्वाला “धग-धग” की ध्वनि के साथ चमक रही है। उसी अग्नि में कामदेव (पंचसायक) भस्म हो गए थे। यह उनकी अपार शक्ति और तप का प्रतीक है।
“धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- प्रकल्पनैकशिल्पिनि”
अर्थ: भगवान शिव, जो पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती के वक्षस्थल पर सुशोभित चित्रों के एकमात्र रचयिता (प्रेमपूर्वक अलंकरण करने वाले) हैं, उनके साथ प्रेम और सौंदर्य का भाव भी प्रकट करते हैं।
“त्रिलोचने रतिर्मम”
अर्थ: ऐसे तीन नेत्रों वाले भगवान शिव में मेरा मन सदा प्रेम और भक्ति से लगा रहे।
सरल समझ:
यह श्लोक हमें भगवान शिव के दो पहलुओं को दिखाता है—एक ओर वे अत्यंत शक्तिशाली हैं, जिनकी अग्नि बुराई और अहंकार का नाश करती है, और दूसरी ओर वे माता पार्वती के साथ प्रेम और सौम्यता का प्रतीक भी हैं।
यह संतुलन ही शिव की विशेषता है। इस श्लोक का भाव है कि हमारा मन ऐसे दिव्य और संतुलित भगवान शिव की भक्ति में सदा लगा रहे।
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥
इस श्लोक में भगवान शिव के गंभीर, रहस्यमय और दिव्य स्वरूप का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है, जो शिव तांडव स्तोत्र की गहराई को और बढ़ाता है।
“नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्- कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः”
अर्थ: भगवान शिव का गला ऐसे प्रतीत होता है जैसे घने, नए बादलों से घिरा हुआ हो, जो अमावस्या की रात के गहरे अंधकार के समान दिखाई देता है। यह उनके नीलकंठ स्वरूप (विष पान के कारण नीला गला) का संकेत है।
“निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः”
अर्थ: वे देवताओं की पवित्र गंगा (निर्झरी) को धारण करने वाले हैं और उन्होंने हाथी की खाल (कृत्तिसिन्धुर) को वस्त्र के रूप में पहना हुआ है।
“कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः”
अर्थ: वे सभी कलाओं के भंडार हैं, अत्यंत सुंदर और समस्त संसार का भार संभालने वाले हैं। वे हमें समृद्धि और कल्याण प्रदान करें।
सरल समझ:
यह श्लोक भगवान शिव के नीलकंठ रूप, गंगा धारण करने वाले स्वरूप और उनके वैराग्यपूर्ण जीवन को दर्शाता है। वे एक साथ रहस्यमय, शक्तिशाली और कल्याणकारी हैं।
यह शिव तांडव स्तोत्र का महत्वपूर्ण भाग हमें सिखाता है कि भगवान शिव में गहराई, संतुलन और अनंत शक्ति का अद्भुत संगम है, और उनकी भक्ति से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि प्राप्त होती है।
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥
इस श्लोक में भगवान शिव के विनाशकारी (संहारक) और रक्षक स्वरूप का प्रभावशाली वर्णन किया गया है, जो शिव तांडव स्तोत्र की शक्ति को दर्शाता है।
“प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा- वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्”
अर्थ: भगवान शिव का कंठ (गला) खिले हुए नीले कमल के समान गहरा और आकर्षक दिखाई देता है। उनके गले की आभा पूरे ब्रह्मांड में फैल रही है, जो उनके नीलकंठ स्वरूप की सुंदरता को दर्शाती है।
“स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं”
अर्थ: वे कामदेव (स्मर), त्रिपुर (पुर), संसार के बंधन (भव) और यज्ञ (मख) के अहंकार का नाश करने वाले हैं।
“गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे”
अर्थ: वे गजासुर, अंधकासुर और मृत्यु (अंतक) का भी नाश करने वाले हैं। मैं ऐसे भगवान शिव की भक्ति करता हूँ।
सरल समझ:
यह श्लोक भगवान शिव के उस स्वरूप को दर्शाता है जो बुराई, अहंकार और अज्ञान का नाश करता है। वे केवल विनाश नहीं करते, बल्कि बुराई को समाप्त कर संसार में संतुलन बनाए रखते हैं।
यह शिव तांडव स्तोत्र का महत्वपूर्ण भाग हमें सिखाता है कि भगवान शिव की भक्ति से हमारे अंदर की नकारात्मकता, अहंकार और डर समाप्त होते हैं, और जीवन में शक्ति व संतुलन आता है।
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥
इस श्लोक में भगवान शिव के मंगलकारी, मधुर और साथ ही संहारक स्वरूप का सुंदर वर्णन किया गया है, जो शिव तांडव स्तोत्र की गहराई और संतुलन को दर्शाता है।
“अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी- रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम्”
अर्थ: भगवान शिव सभी प्रकार के मंगल (शुभ) और कलाओं के समूह के समान हैं। उनकी दिव्यता और मधुरता ऐसे फैलती है जैसे फूलों के गुच्छे से रस टपक रहा हो और उस पर मधुमक्खियाँ आकर्षित हो रही हों। यह उनकी सौम्यता और आकर्षक स्वरूप को दर्शाता है।
“स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं”
अर्थ: वे कामदेव, त्रिपुर, संसार के बंधन और यज्ञ के अहंकार का अंत करने वाले हैं।
“गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे”
अर्थ: वे गजासुर, अंधकासुर और मृत्यु (अंतक) का भी नाश करने वाले हैं। मैं ऐसे भगवान शिव की भक्ति करता हूँ।
सरल समझ:
यह श्लोक भगवान शिव के उस अद्भुत संतुलन को दर्शाता है, जहाँ वे एक ओर अत्यंत मंगलकारी, मधुर और आकर्षक हैं, और दूसरी ओर बुराई और अहंकार का नाश करने वाले भी हैं।
यह शिव तांडव स्तोत्र का महत्वपूर्ण भाग हमें सिखाता है कि भगवान शिव की भक्ति से जीवन में शुभता आती है और साथ ही हमारी सभी नकारात्मकताएँ समाप्त होती हैं।
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-
द्ध्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥
इस श्लोक में भगवान शिव के प्रचंड तांडव नृत्य और उसकी दिव्य ऊर्जा का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन किया गया है, जो शिव तांडव स्तोत्र की शक्ति को दर्शाता है।
“जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस- द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्”
अर्थ: भगवान शिव के तांडव के दौरान उनके शरीर पर लिपटे सर्प तेजी से हिलते-डुलते हैं और उनकी श्वास से उत्पन्न ध्वनि वातावरण में गूंजती है। उनके भाल (माथे) से निकलने वाली भयंकर अग्नि अत्यंत प्रज्वलित हो रही है, जो उनकी अपार शक्ति का प्रतीक है।
“धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल- ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः”
अर्थ: मृदंग (ढोल) की “धिम-धिम” ध्वनि के साथ भगवान शिव का प्रचंड तांडव नृत्य चल रहा है, जो मंगलकारी और ऊर्जावान है।
सरल समझ:
यह श्लोक भगवान शिव के उस अद्भुत रूप को दर्शाता है जिसमें उनका तांडव नृत्य पूरे ब्रह्मांड में ऊर्जा और कंपन उत्पन्न करता है। सर्पों की गति, अग्नि की ज्वाला और मृदंग की ध्वनि—ये सभी मिलकर उनके तांडव को दिव्य और शक्तिशाली बनाते हैं।
यह शिव तांडव स्तोत्र का महत्वपूर्ण भाग हमें यह सिखाता है कि भगवान शिव की ऊर्जा अनंत है और उनका तांडव सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने का प्रतीक है।
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-
गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥
इस श्लोक में एक सच्चे भक्त की भावना व्यक्त की गई है, जो भगवान शिव की भक्ति में समान दृष्टि (समभाव) प्राप्त करना चाहता है। यह शिव तांडव स्तोत्र का अत्यंत गहरा और दार्शनिक भाग है।
“दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्- गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः”
अर्थ: भक्त चाहता है कि उसके लिए पत्थर और सुंदर बिस्तर, सर्पों की माला और मोतियों की माला, कीमती रत्न और साधारण मिट्टी—सब एक समान हो जाएँ। इसी तरह मित्र और शत्रु में भी कोई भेद न रहे।
“तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः”
अर्थ: वह चाहता है कि एक साधारण व्यक्ति और एक महान राजा (इंद्र) को भी समान दृष्टि से देख सके, यानी सभी के प्रति समान भाव रखे।
“समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्”
अर्थ: वह सोचता है कि कब वह ऐसी समान दृष्टि प्राप्त करेगा और भगवान सदाशिव की सच्ची भक्ति कर पाएगा।
सरल समझ:
यह श्लोक हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति तब होती है जब हम हर परिस्थिति और हर व्यक्ति को समान भाव से देखना सीखते हैं।
यह शिव तांडव स्तोत्र का गहरा संदेश है कि भगवान शिव की भक्ति हमें अहंकार, भेदभाव और आसक्ति से मुक्त करती है, और हमें एक संतुलित और शांत जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललाटफाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥
इस श्लोक में भक्त की गहरी भक्ति और भगवान शिव के प्रति उसकी तल्लीनता का भाव व्यक्त किया गया है। यह शिव तांडव स्तोत्र का एक अत्यंत भावपूर्ण हिस्सा है।
“कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्”
अर्थ: भक्त सोचता है कि वह कब उस स्थान पर रहेगा जहाँ देवताओं की पवित्र गंगा (निर्झरी) के किनारे शांत और पवित्र वातावरण हो, यानी एक दिव्य और आध्यात्मिक जगह में निवास करने की इच्छा व्यक्त करता है।
“विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्”
अर्थ: वह अपनी बुरी सोच और अहंकार से मुक्त होकर हमेशा हाथ जोड़कर भगवान शिव को प्रणाम करता रहे।
“विमुक्तलोललोचनो ललाटफाललग्नकः”
अर्थ: उसकी आँखें इधर-उधर भटकने से मुक्त हो जाएँ और उसका ध्यान केवल भगवान शिव के ललाट (माथे) पर केंद्रित रहे।
“शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्”
अर्थ: वह “शिव” नाम का जप करता रहे और सोचता है कि कब वह इस भक्ति में पूरी तरह डूबकर सच्चा सुख प्राप्त करेगा।
सरल समझ:
यह श्लोक एक भक्त के मन की इच्छा को दर्शाता है, जो भगवान शिव की भक्ति में पूरी तरह डूब जाना चाहता है। वह संसार की चिंताओं और विकारों से मुक्त होकर केवल “शिव” नाम का जाप करते हुए सच्ची शांति और सुख पाना चाहता है।
यह हमें सिखाता है कि सच्ची खुशी बाहरी चीजों में नहीं, बल्कि भगवान की भक्ति और आंतरिक शांति में होती है।
इदं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिन्तनम्॥
इस श्लोक में शिव तांडव स्तोत्र के पाठ के महत्व और उससे मिलने वाले आध्यात्मिक लाभों का वर्णन किया गया है।
“इदं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं”
अर्थ: यह स्तोत्र अत्यंत श्रेष्ठ और पवित्र है, जिसे नियमित रूप से पढ़ना और स्मरण करना चाहिए।
“पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्”
अर्थ: जो व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ करता है, इसे याद करता है और बार-बार बोलता है, वह धीरे-धीरे शुद्ध (पवित्र) हो जाता है। उसके मन और विचारों में सकारात्मक परिवर्तन आता है।
“हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं”
अर्थ: ऐसा व्यक्ति भगवान और अपने गुरु के प्रति गहरी भक्ति प्राप्त करता है और सही मार्ग पर चलता है। उसके लिए इससे बेहतर कोई मार्ग नहीं होता।
“विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिन्तनम्”
अर्थ: भगवान शिव का चिंतन (ध्यान) सभी जीवों के भ्रम और मोह को दूर करता है।
सरल समझ:
यह श्लोक हमें बताता है कि शिव तांडव स्तोत्र का नियमित पाठ केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह मन, विचार और जीवन को शुद्ध करने का एक शक्तिशाली माध्यम है।
भगवान शिव का स्मरण करने से मन के भ्रम, नकारात्मकता और मोह दूर होते हैं, और व्यक्ति सही दिशा में आगे बढ़ता है। यही सच्ची भक्ति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनमिदं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥
इस श्लोक में शिव तांडव स्तोत्र के पाठ का विशेष फल और उसका महत्व बताया गया है, खासकर पूजा के समय।
“पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं”
अर्थ: यह स्तोत्र (जो रावण यानी दशानन द्वारा रचा गया है) यदि पूजा के अंत में गाया या पढ़ा जाए, तो उसका विशेष महत्व होता है।
“यः शम्भुपूजनमिदं पठति प्रदोषे”
अर्थ: जो व्यक्ति प्रदोष काल (संध्या समय, जो भगवान शिव का प्रिय समय है) में भगवान शिव की पूजा के बाद इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे विशेष फल प्राप्त होता है।
“तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां”
अर्थ: ऐसे भक्त को स्थिर और समृद्ध जीवन मिलता है, जिसमें रथ, हाथी और घोड़े जैसी समृद्धि (प्राचीन समय के वैभव के प्रतीक) प्राप्त होती है।
“लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः”
अर्थ: भगवान शिव उसे सदा प्रसन्न रहने वाली लक्ष्मी (धन, सुख और समृद्धि) प्रदान करते हैं।
सरल समझ:
यह श्लोक हमें बताता है कि यदि शिव तांडव स्तोत्र का पाठ सही समय और श्रद्धा के साथ किया जाए, तो भगवान शिव की कृपा से जीवन में सुख, समृद्धि और स्थिरता प्राप्त होती है।
यह शिव तांडव स्तोत्र का अंतिम भाग है, जो यह संदेश देता है कि सच्ची भक्ति और नियमित पाठ से भगवान शिव अपने भक्तों को हर प्रकार का कल्याण प्रदान करते हैं।
शिव तांडव स्तोत्र का महत्व
शिव तांडव स्तोत्र केवल भगवान शिव की स्तुति मात्र नहीं है, बल्कि यह उनके गहरे और रहस्यमय स्वरूप को समझने का एक शक्तिशाली माध्यम है। इस स्तोत्र में भगवान शिव के तांडव नृत्य के माध्यम से उनकी शक्ति, ऊर्जा और ब्रह्मांडीय संतुलन का वर्णन किया गया है।
यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि इस संसार में हर चीज एक चक्र का हिस्सा है—सृजन (creation), पालन (preservation) और विनाश (destruction)। भगवान शिव का तांडव इसी चक्र का प्रतीक है। जब कुछ पुराना समाप्त होता है, तभी कुछ नया जन्म लेता है। इसलिए विनाश भी एक नई शुरुआत का संकेत होता है।
शिव तांडव स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति जीवन के इन बदलावों को समझने लगता है और कठिन परिस्थितियों को भी धैर्य और संतुलन के साथ स्वीकार कर पाता है। यह हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव स्वाभाविक हैं और उन्हें सकारात्मक दृष्टिकोण से देखना चाहिए।
इसके अलावा, यह स्तोत्र भगवान शिव की अपार ऊर्जा और दिव्यता को महसूस करने का एक माध्यम है। इसका जप करने से मन में साहस, आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति का विकास होता है।
सरल शब्दों में समझें:
शिव तांडव स्तोत्र हमें यह सिखाता है कि जीवन में परिवर्तन आवश्यक है और हर अंत एक नई शुरुआत की ओर ले जाता है। भगवान शिव की भक्ति हमें इन परिवर्तनों को समझने और संतुलन बनाए रखने की शक्ति देती है।
शिव तांडव स्तोत्र के लाभ
- मानसिक शक्ति और आत्मविश्वास बढ़ता है
- नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है
- ध्यान और एकाग्रता में सुधार होता है
- शिव भक्ति गहरी होती है
- जीवन में साहस और ऊर्जा आती है
कब और कैसे करें पाठ
- सुबह या शाम शांत समय में
- स्नान के बाद
- ध्यान लगाकर
- स्पष्ट उच्चारण के साथ
सोमवार और महाशिवरात्रि के दिन इसका पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
शिव तांडव स्तोत्र किसने लिखा है?
इस स्तोत्र की रचना लंका के राजा रावण ने की थी, जो भगवान शिव के महान भक्त थे।
FAQ – शिव तांडव स्तोत्र
1. क्या शिव तांडव स्तोत्र रोज़ पढ़ सकते हैं?
हाँ, इसे रोज़ पढ़ना लाभकारी माना जाता है।
2. क्या यह शक्तिशाली स्तोत्र है?
हाँ, यह भगवान शिव के सबसे शक्तिशाली स्तोत्रों में से एक है।
3. इसे कब पढ़ना चाहिए?
सुबह या ध्यान के समय सबसे अच्छा है।
4. क्या इससे मन शांत होता है?
हाँ, इसका पाठ मानसिक शांति देता है।
निष्कर्ष
शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव की शक्ति, ऊर्जा और दिव्यता का प्रतीक है। इसका नियमित पाठ व्यक्ति को मानसिक, आध्यात्मिक और भावनात्मक रूप से मजबूत बनाता है।
अगर आप सच्चे मन से इसका पाठ करते हैं, तो आप भगवान शिव की कृपा और ऊर्जा को अपने जीवन में महसूस कर सकते हैं।
ॐ नमः शिवाय 🙏




